कुदरत के कहर से कराहता अन्नदाता: उजड़े अरमानों के बीच अब सरकारी मरहम का इंतज़ार

किसान की फसल का नुकसान

नई दिल्ली/प्रादेशिक: खेती-किसानी केवल मिट्टी और बीज का खेल नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ एक निरंतर चलने वाला मौन संवाद है। किसान हर बादल में उम्मीद की चमक और हर धूप में जीवन का संतुलन तलाशता है। लेकिन जब यही प्रकृति कहर बनकर बरसती है, तो खुले आसमान के नीचे खड़ा किसान सबसे असहाय हो जाता है। हाल ही में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने खेतों में खड़ी ‘सोने’ जैसी फसल को मिट्टी में मिला दिया है।

यह केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि उस अन्नदाता के सपनों और उसके पूरे जीवन के आधार पर एक सीधा प्रहार है।

फसल नहीं, किसान का सम्मान उजड़ा ,किसान की फसल का नुकसान
एक किसान के लिए उसकी फसल महज कृषि उत्पाद या मंडी में बिकने वाली जिंस नहीं होती। वह उसके परिवार की रोटी, बच्चों की शिक्षा, भविष्य की सुरक्षा और उसके आत्मसम्मान की धुरी होती है। जब पकी-पकाई फसल कटकर घर आने के बजाय खेत में ही सड़ने लगती है, तो किसान की आर्थिक कमर ही नहीं टूटती, बल्कि उसका साहस भी जवाब दे जाता है।

“बीज बोने से लेकर कटाई तक का संघर्ष एक तपस्या है। जब प्रकृति का प्रहार होता है, तो वह केवल फसल नहीं छीनती, बल्कि एक पूरे परिवार की साल भर की उम्मीदें दफन कर देती है।”

यह भी जाने – 120 BAHADUR- शरीर को चीरती वो माइनस 23 डिग्री की कम्क्म्पाती ठण्ड और चीन के 3000 सैनिको के साथ भीड़ गए देश के 120 बहादुर

त्वरित राहत और जवाबदेही की दरकार ; किसान की फसल का नुकसान

संकट की इस घड़ी में किसान को खोखले आश्वासनों की नहीं, बल्कि ठोस और पारदर्शी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। सरकार को चाहिए कि:

विशेष गिरदावरी: तत्काल प्रभाव से विशेष गिरदावरी (नुकसान का आकलन) के आदेश दिए जाएं ताकि वास्तविक क्षति का निष्पक्ष डेटा सामने आ सके।

शीघ्र मुआवजा: कागजी कार्रवाई के मकड़जाल से बाहर निकलकर प्रभावित किसानों के खातों में सीधे और पर्याप्त राहत राशि पहुंचाई जाए।

बीमा तंत्र में सुधार: फसल बीमा कंपनियों की मनमानी पर लगाम कसी जाए और क्लेम की प्रक्रिया को सरल व पारदर्शी बनाया जाए।

आपदा प्रबंधन: ग्रामीण स्तर पर आपदा प्रबंधन तंत्र को इतना जवाबदेह बनाया जाए कि नुकसान के 24 घंटे के भीतर प्रारंभिक आकलन पूरा हो सके।

खाद्य सुरक्षा की नींव है किसान
हमें यह समझना होगा कि देश की खाद्य सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव किसान की आर्थिक सुरक्षा है। यदि अन्नदाता ही असुरक्षित रहेगा, तो देश के भंडारों और भविष्य पर संकट के बादल मंडराना तय है। किसानों को आपदा के समय अकेला छोड़ना एक बड़ी नीतिगत विफलता होगी। अब समय है कि शासन और प्रशासन संवेदनशीलता दिखाते हुए किसान के घावों पर मरहम लगाए।

Scroll to Top