गेंहू बाजार रिपोर्ट – भारत में गेहूं उत्पादन और खाद्य सुरक्षा को लेकर मौसम एक बार फिर चर्चा में है। मुंबई स्थित भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने जनवरी महीने के दौरान उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक तापमान रहने का अनुमान जताया है। इसके बावजूद भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने भरोसा जताया है कि गेहूं की फसल इस संभावित गर्मी के असर को झेलने में सक्षम है।
IMD के अनुसार, जनवरी में उत्तर-पश्चिम, उत्तर-पूर्व और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के अधिकांश हिस्सों में न्यूनतम तापमान सामान्य से ऊपर रह सकता है, जबकि अधिकतम तापमान उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य से अधिक रहने की संभावना है। पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र और बिहार जैसे प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य इसी मौसमीय दायरे में आते हैं। यही कारण है कि बाजार और नीति-निर्माताओं की नजरें इस मौसम पूर्वानुमान पर टिकी हुई हैं।
हालांकि ICAR का कहना है कि बीते वर्षों में गेहूं की किस्मों में बड़ा बदलाव आया है। परिषद के उप महानिदेशक टी.के. यादव के अनुसार, उत्तर-पश्चिमी मैदानों और मध्य भारत में करीब 75 प्रतिशत क्षेत्र अब DBW 187, HD 3226 और HD 3086 जैसी किस्मों के अंतर्गत है, जो विशेष रूप से अंतिम चरण (टर्मिनल स्टेज) की गर्मी को सहन करने में सक्षम हैं। यह बदलाव गेहूं उत्पादन को जलवायु जोखिमों से बचाने में अहम भूमिका निभा रहा है।
गेंहू की फसल और गेंहू बाजार के लिए फरवरी सवेदनशील
गेहूं के लिए फरवरी महीना सबसे संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि यही दाना भरने का प्रमुख समय होता है। यादव के मुताबिक, यह देखना ज्यादा जरूरी है कि तापमान किस अवस्था में और कितने समय तक बढ़ता है। यदि 15 फरवरी से पहले तापमान में तेज बढ़ोतरी होती है, तो जोखिम ज्यादा होता है। सामान्य तौर पर 26–27 डिग्री सेल्सियस तक दिन का तापमान फसल के लिए समस्या नहीं बनता, लेकिन यदि तापमान लंबे समय तक 28–29 डिग्री पर बना रहता है, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
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गेंहू का उत्पादन मौसम पर निर्भर
भारत में गेहूं उत्पादन खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। वर्ष 2021-22 में फरवरी 2022 की असामान्य गर्मी के कारण उत्पादन में लगभग 18.5 लाख टन की गिरावट आई थी, जिसके चलते गेहूं निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। दिलचस्प बात यह है कि 2024-25 में रिकॉर्ड 117.94 मिलियन टन उत्पादन के बावजूद यह निर्यात प्रतिबंध अब तक पूरी तरह नहीं हट पाया है। इससे साफ है कि तापमान में हल्का सा उतार-चढ़ाव भी नीतिगत फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
ICAR ने गर्मी से निपटने के लिए अर्ली-सोन (अक्टूबर में बोई जाने वाली) किस्में भी विकसित की हैं। इन किस्मों में फरवरी से पहले ही दाना भरने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है, जिससे फरवरी की संभावित गर्मी का असर सीमित रहता है। मौजूदा हालात को देखते हुए, यदि जनवरी और फरवरी में तापमान थोड़े समय के लिए बढ़ता भी है, तो मौजूदा किस्मों और खेती की रणनीतियों के चलते देश में गेहूं उत्पादन पर बड़ा खतरा नहीं दिखता। आने वाले वर्षों में हीट-टॉलरेंट किस्मों का बढ़ता दायरा भारत की खाद्य सुरक्षा को और मजबूत कर सकता है।
नोट – व्यापार अपने विवेक से करें, हमारा उदेश्य सिर्फ किसानो तक जानकारी पहुचाना है



